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क्षुल्लक गणेशप्रसाद वर्णी जी महाराज

जीवनवृत्त : - निर्भीक, दृढ़निश्चयी,महान राष्ट्र प्रेमी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,समाजसेवी, अनेकों पाठशालाओं , अनेकों विद्वानों के जनक, संस्कृति सम्वर्धक शिक्षा के प्रचारक प्रसारक एवं कुरीतियों के नाशक पूज्य गणेशप्रसाद वर्णी जी की जीवन गाथा आज भी जन जन के लिए प्रेरक है उनके द्वारा समाज सेवा, देश सेवा के क्षेत्र मे अनेकों काम किये गये हैं I इनका जन्म हंसेरा मढावरा जिला ललितपुर वर्तमान उत्तर प्रदेश में सन 1874 ई में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हीरालाल जी एवं माता का नाम श्रीमती उजयारी बहू है । वह असाटी बणिक समुदाय के थे I बुंदेलखंड में गांवों में कृष्णपक्ष की चतुर्थी को लोग गणेश जी का व्रत रखते है, इसलिए इनका नाम गणेशप्रसाद रखा गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हंसेरा मढावरा जिला ललितपुर वर्तमान उत्तर प्रदेश मे हुई, इन्होने सन 1889 ई में हिन्दी मिडिल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस्के पस्चात की शिक्षा उन्होंने विविध कठिन परिस्थितियों एवं संघर्ष के बीच खुर्जा, मथुरा, नादिया, पश्चिम बंगाल वाराणसी, मुंबई, जयपुर, आदि स्थानों पर ली, आप गुरु सेवा को अपना परम् कर्तव्य समझते थे, पर साथ ही अपने गुरु जो तंबाकू,हुक्का का सेवन करते थे उन्हें भी सद मार्ग पर लगाया तथा उन्हें व्यसनों से दूर रहने की शिक्षा दी,आपको 10 वर्ष की आयु में जैन मन्दिर के चबूतरे पर प्रवचन सुनने का अवसर मिला। ये प्रवचन से इतने प्रभावित हुए कि रात्रिभोजन का त्याग कर जैन धर्म अपना लिया। जैन धर्म के अनुयायी बनने पर भी जातीय परम्परा के अनुसार 13 वर्ष की आयु में यग्योपवीत संस्कार किया गया। सन 1892 ई को 19 वर्ष के होने पर अनिच्छापूर्वक विवाह करा दिया गया। आजीविका के लिए पास के गांव में अध्यापन कार्य करने लगे। ज्ञानपिपासा के कारण अध्यापन कार्य छोड़कर विद्यार्थी बनकर गांव से प्रस्थान कर दिया। तथा ज्ञान की पिपासा मे दर दर भटकते रहे . यात्रा करते हुए सन 1893 ई में सिमरा गांव में पूज्य माता चिरोजा बाई से मिलन हुआ। यह मिलन स्नेह का जनक बन गया। माता जी भी वत्सल भाव से गणेशप्रसाद को धर्म पुत्र मानती थी। आगे विद्या अध्ययन की अनुमति दे दी तथा उनकी माता ने सह्योग किया I


इसी यात्रा मे मार्ग में सामान की चोरी होने से चिंतित हुए, अपनी छतरी 6 आने में बेच दी। एक एक पैसे के चने खाकर समय बिताया। अध्ययन काल में खुरई पहुंचे। वहाँ प पन्नालाल जी न्यायदिवाकर जी से धर्म का मर्म जानने की जिज्ञासा व्यक्त की। पण्डित जी ने चिल्लाकर कहा - "अरे तू धर्म का मर्म क्या समझेगा ? तू तो कवक खाने के लिए जैन बना है।" ये शब्द शांतिपूर्वक सुने। अपने लक्ष्य की सिद्धि हेतु सन 1895 ई में बनारस पहुंचे। वहाँ भी नास्तिक कहकर किसी ने नहीं पढ़ाया। अब बनारस में जैन विद्यालय खोलने का दृढ़निश्चय किया। कठिन परिश्रम करके सन 1895 ई में ही स्याद्वाद महाविद्यालय की स्थापना करा दी।सन 1896 ई में आपकी धर्मपत्नी का स्वर्गवास होने पर पूर्णरूपेण शांत रहे। मन मे इष्टवियोग का खेद न मानकर सोचा कि शल्य टल गई। विद्या उपार्जन के लक्ष्य को साकार करने सन 1896 ई में विविध स्थानों पर गए, पर सफलता न मिली। पुनः बनारस आये। वहाँ प अम्बादास जी को गुरु बनाकर विधिवत अध्ययन किया। न्यायाचार्य की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।


विद्वता और संयम की साधना से वे पूज्य सन्त बन गए। बड़े पण्डित जी के रूप में प्रसिद्धि हो गयी। विद्या के प्रति जैसा अनुराग था, वही अनुराग जिनभक्ति के प्रति था। गिरनार जी और शिखरजी की पैदल यात्रा करना उनकी जिनेन्द्र भक्ति थी। सन 1905 ई में श्री गणेश दिगम्बर जैन संस्कृत विद्यालय की स्थापना सागर में कराई। आपने उसके संरक्षक पद को सुशोभित किया। संयम की साधना में सन 1913 ई में पण्डित जी से सन्त वर्णी जी बन गए। आपकी यह साधना निरन्तर बढ़ती गयी। सन 1936 ई में वाहन द्वारा सागर से बण्डा जाते हुए ड्राईवर से झगड़ा हो गया। तब से वाहन का प्रयोग ही बन्द कर दिया। इसके बाद 700 मील पदयात्रा करते हुए शिखरजी पहुंचे। वहाँ उदासीन आश्रम की स्थापना की। सन्त वर्णी जी आत्मसाधक तो थे ही, सन 1944 ई में दशम प्रतिमाधारी हो गए। वर्णी जी ने सन 1947 ई में छुल्लक दीक्षा ग्रहण की। अब बड़े बाबा कहे जाने लगे। सन 1945 ई से सन 1952 तक बुंदेलखंड की यात्रा की।* उनकी प्रेरणा से सैंकड़ों पाठशालाएं व विद्यालय और महाविद्यालय खुले। सन 1952 ई के बाद शिखरजी में पार्श्वनाथ प्रभु की शरण मे रहने का निश्चय किया। विनोबा भावे ने तो वर्णी जी के चरण स्पर्श करके को अपना अग्रज माना है। सन 1959 ई में आचार्य तुलसी जी ने वर्णी जी के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना। पूज्य वर्णी जी निस्पृही, पारखी, व गुणग्राही थे। वे मनसा वाचा कर्मणा से एक थे।


महान राष्ट्र प्रेमी पूज्य गणेश प्रसाद वर्णी जी उत्कृष्ट राष्ट्र प्रेमी थे उन्होंने अपने जीवन में देश हित के कई कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लिया ,इन कार्यक्रमों में स्वराज्य के साथ सुराज, स्वदेशी आंदोलन ,युवकों को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रेरित करना स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न संस्थाओं को सहायता एवं मनोबल देना ,विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं से भेंट कर उन्हें सामाजिक आवश्यकताओं से अवगत कराना, लोगों में पराधीनता के विरुद्ध चेतना का संचार करना जैसे कार्यों के साथ ऐसे अनेक कार्य करना सम्मिलित थे जो राष्ट्रीय हित के लिए अति आवश्यक थे वह बाल्यकाल से ही राष्ट्रीयता से जुड़ गए थे देश की उन्नति के लिए स्त्री शिक्षा को मुख्य मानते थे तथा स्त्री समाज को समृद्ध बनाना चाहते थे जबलपुर में आजाद हिंद फौज की सहायतार्थ जैन साधक होते हुए भी अपनी चादर दान दे दी थी ,उस चादर की नीलामी स्वरूप उन दिनों ₹3000 की राशि प्राप्त हुई थी ,जो क्रांतिकारियों की सहायतार्थ दे दी गई थी इस प्रकार वर्णी जी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया गया, उनके द्वारा संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन का भी प्रचार प्रसार कियाई उन्होंने भूदान आंदोलन के लिए अनेक लोगों को प्रेरित किया, उनकी इन्हीं खूबियों को पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे महान नेता जो उस समय मध्य प्रांत के गृहमंत्री थे द्वारा उनके इन कार्यों की प्रशंसा करनी पड़ी श्री गणेश प्रसाद वर्णी जी की आत्मकथा "मेरी जीवन गाथा"की प्रस्तावना तत्कालीन मध्य प्रांत के गृह मंत्री श्री द्वारका प्रसाद जी मिश्र द्वारा लिखी गई है आपके द्वारा समाज संरक्षण में महान योगदान: दीया - वर्णी जी एक समाज सुधारक के रूप में जाने जाते थे,


जिस समय उन्होंने बुंदेलखंड में जन्म लिया उस समय बुंदेलखंड में अनेक रूढ़ियों का प्रचलन था समाज में अनेक कुरीतियाँ विद्यमान थी, जिनके कारण गरीब जनता पिस रही थी उन सब कुरीतियों का वर्णी जी द्वारा विरोध किया गया वह अपने समय के कई समाज सुधारक जैसे राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती , ईश्वर चंद विद्यासागर जैंसे अनेक समाज सुधारको से भी प्रेरित थे एवं समाज में फैली अस्पृश्यता को दूर किया! वह महात्मा गांधी जी से भी बहुत प्रभावित थे उनके कई राष्ट्रीय आंदोलनों का समर्थन किया I अंत समय मे मुनिदीक्षा और समाधि 87 वर्ष की वृद्धावस्था में सन 1961 ई में शारिरिक अवस्था कमजोर हो गयी। फिर भी दैनिक दिनचर्या में कोई अंतर नहीं पड़ा। वे आहार में आधा पाव जल और अल्पमात्रा में अनार का रस ही ले पाते थे।3 सितम्बर 1961 ई को यम सल्लेखना ली और सभी प्रकार के आहार पानी का त्याग कर दिया। 15 सितम्बर 1961 ई को त्यागियों व विद्वानों के समक्ष मुनि दीक्षा ग्रहण की, और नामकरण गणेश कीर्ति रखा गया। 15 सितम्बर सन 1961 ई को भौतिक देह को त्याग दिया। पूज्य गणेशकीर्ति जी महाराज का भौतिक शरीर चिता की ज्वालाओं में विलीन हो गया। परन्तु जैनधर्म और समाज के लिए समर्पित उनके तप:पूत जीवन से आज भी किरणें प्रस्फुटित होकर मार्गदर्शन कर रही है। उनके द्वारा अनेक संस्थाओं की स्थापना की गई कुछ संस्थाओं का विवरण निम्न हैं I


  • 1 स्याद्वाद महाविद्यालय, बनारस
  • 2 श्री गणेश दिगंबर जैन संस्कृत महाविद्यालय, सागर
  • 3 श्री दिगंबर जैन महिला आश्रम, सागर
  • 4 श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ विद्यामंदिर, बरुआसागर (झाँसी)
  • 5 श्री पुष्पदंत दिगंबर जैन विद्यालय, शाहपुर
  • 6 श्री वर्णी दिगंबर जैन गुरुकुल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जबलपुर
  • 7 श्री दिगंबर जैन वर्णी इंटर कॉलेज, ललितपुर
  • 8 जैन गुरुकुल हायर सेकेंडरी स्कूल, खुरई
  • 9 ज्ञान वर्धन जैन पाठशाला, इटावा
  • 10 श्री कुंद –कुंद जैन स्नातकोत्तर महाविद्यालय खतौली, मुजफ्फरनगर
  • 11 श्री शांतिनाथ जैन संस्कृत विद्यालय सिद्धक्षेत्र अहार जी, टीकमगढ़
  • 12 श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन हायर सेकेंडरी स्कूल, ईसश्री बिहार
  • 13 समंतभद्र विद्यालय, दिल्ली
  • 14 श्री महावीर दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय, साडूमल ललितपुर
  • 15 गुरुदत्त दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय, द्रोणगिरि छतरपुर
  • 16 वर्णी दिगम्बर जैन संस्कृत विद्यालय, रेशंदीगिरि
  • 17 श्री गणेश वर्णी दिगंबर जैन गुरुकुल पटनागंज, रहली (सागर)
  • 18 श्री शांति निकेतन दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय, कटनी
  • 19 श्री वर्णी उच्चतर माध्यमिक शाला, मढ़ावरा
  • 20 श्री वर्णी इंटर कॉलेज, विदिशा
  • 21 दिगंबर जैन वर्णी गुरुकुल, सहारनपुर
  • 22 हीरापुर में पाठशाला
  • 23 शाहगढ़ में पाठशाला
  • 24 दलपतपुर में पाठशाला
  • 25 तिगोड़ा में पाठशाला
  • 26 बक्सवाहा में पाठशाला
  • 27 बंडा में पाठशाला
  • 28 नीमटोरिया में पाठशाला
  • 29 भगवाँ में पाठशाला
  • 30 जनता हाई स्कूल बडामलहरा में पाठशाला
  • 31 गोरखपुर में पाठशाला
  • 32 सतपारा में पाठशाला
  • 33 मढ़देवरा में पाठशाला
  • 34 सैदपुर में पाठशाला
  • 35 सतना में पाठशाला
  • 36 कुरहैडी में पाठशाला
  • 37 एटा में पाठशाला
  • 38 बबीना में पाठशाला
  • 39 दरगुवां में पाठशाला
  • 40 बरयाठा में पाठशाला
  • 41 धुवारा में पाठशाला
  • 42 बडगाँव कटनी में पाठशाला
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